BHAGAVAD GITA, ARJUN'S DEJECTION(CHAPTER-1), VERSE-13,14
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| भगवद् गीता, अर्जुन विषाद योग, श्लोक-13, श्लोक-14 |
अध्याय-1,श्लोक-13
अर्जुन विषाद योग
युद्ध के परिणामों पर पछतावा करना
श्लोक-13
इसके बाद शंख, बड़े-बड़े ढोल, नगाड़े और ढोल तथा मृदंग अचानक ही एक साथ बजाये गए । एक साथ उठा स्वर बहुत ही कोलाहल पूर्ण था ।
श्लोक-14
दूसरी ओर से श्वेत घोड़ो द्वारा खींचे जाने वाले विशाल रथ पर आसीन कृष्ण तथा अर्जुन ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाए ।
यहां पर कृष्ण तथा अर्जुन के शंख को दिव्य कहा गया है । दिव्य शंखों की ध्वनि से यह सूचित हो रहा था कि कौरवों को जीत की कोई आशा नहीं थी क्योंकि कृष्ण पांडवों के पक्ष में थे । इस कविता का तात्पर्य है कि समृद्धि की देवी पांडवों के साथ थी, और उनकी कृपा से, वे इस युद्ध में विजयी होंगे। इसके अतिरिक्त जिस रथ में दोनों कृष्ण तथा अर्जुन आसीन थे वह रथ अर्जुन को अग्नि देवता द्वारा दिया गया था इससे यह तो निश्चित था कि तीनों लोकों में यह रथ जहां कहीं भी जाएगा वहां पर विजय निश्चित ही होगी ।
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